छात्राओं ने लोकनृत्य, सुआ गीत, भाषण और भोजली गीत की दी मनमोहक प्रस्तुतियां
मुंगेली। श्रीमती रम्भा बाई रामलाल साव शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मुंगेली में बैकलेस डे के अवसर पर छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक एवं सांस्कृतिक परंपराओं से विद्यार्थियों को जोड़ने के उद्देश्य से पारंपरिक भोजली उत्सव का आयोजन उत्साहपूर्वक किया गया। कार्यक्रम में छात्राओं ने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और परंपराओं को अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से जीवंत कर दिया।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने सामूहिक नृत्य, एकल नृत्य, सुआ गीत, भाषण एवं भोजली गीत की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं। सामूहिक नृत्य में सुभद्रा साहू, रीना निषाद, लोकेश्वरी निषाद एवं पल्लवी निषाद ने प्रस्तुति दी। एकल नृत्य में रितु निषाद ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। वहीं सुआ गीत में साक्षी नेताम, भाषण में कामिनी ध्रुव एवं वर्षा मल्लह तथा भोजली गीत में साधना साहू, भारती सोनकर एवं भारती मानिकपुरी ने सहभागिता निभाई।

लोक संस्कृति से जोड़ने की पहल
कार्यक्रम का आयोजन विद्यालय के प्राचार्य कृष्ण कुमार नवरंग के मार्गदर्शन में किया गया। कार्यक्रम में विद्यालय परिवार के सदस्य दिलीप काठले, चंद्र कुमार महिलांग, डेनियल दयाल, चंद्रशेखर शर्मा, नोहर चंद्रवंशी, कुमार सिंह ध्रुव, जेएस राजपूत, विभा साहू, एम. कुर्रे, जया त्रिवेदी, पूर्णिमा तंबोली, प्रतिभा शर्मा, एम. विलियम, वीरेश पाठक, रिकेश्वरी साहू एवं रोशन ध्रुव सहित विद्यालय परिवार के सदस्य उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन व्याख्याता संजय सोनी ने किया।
अपने संबोधन में प्राचार्य कृष्ण कुमार नवरंग ने कहा कि भोजली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति से जुड़ाव का प्रतीक है। भोजली परंपरा में प्रकृति के प्रति सम्मान, पर्यावरण संरक्षण, कृषि संस्कृति और सामुदायिक एकता की भावना दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ का लोकजीवन प्रकृति और कृषि से गहराई से जुड़ा हुआ है। भोजली पर्व इसी जुड़ाव को सांस्कृतिक रूप प्रदान करता है। प्राकृतिक एवं भौगोलिक परिवर्तनों के साथ मानव जीवन में आने वाले बदलावों का सांस्कृतिक समावेश भी भोजली परंपरा में दिखाई देता है।
विद्यार्थियों को बताई भोजली की विशेषता
भोजली उत्सव के दौरान विद्यार्थियों को छत्तीसगढ़ के इस पारंपरिक पर्व के ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व की जानकारी दी गई। प्राचार्य ने विद्यार्थियों को बताया कि लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक पर्व केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि वे समाज की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि आधुनिक शिक्षा और तकनीक के साथ अपनी लोक संस्कृति, पारंपरिक त्योहारों, लोकगीतों और प्रकृति संरक्षण की परंपराओं को भी समझें तथा इन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाएं।
कार्यक्रम में छात्राओं की प्रस्तुतियों ने उपस्थित विद्यालय परिवार का मन मोह लिया। भोजली गीत और लोकनृत्य के माध्यम से छात्राओं ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत की सुंदर झलक प्रस्तुत की।
इस आयोजन के माध्यम से विद्यार्थियों ने अपनी कला एवं प्रतिभा का प्रदर्शन करने के साथ-साथ छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, पारंपरिक विरासत, कृषि जीवन और प्रकृति संरक्षण के संदेश को सहेजने का संकल्प भी व्यक्त किया। विद्यालय में आयोजित यह भोजली उत्सव विद्यार्थियों के लिए शिक्षा के साथ अपनी जड़ों और संस्कृति को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर साबित हुआ।