मौसम का बदलता मिजाज सिर्फ तापमान का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि आने वाले समय के लिए बड़ी चेतावनी है।
एक समय था जब मौसम का अपना एक तय चक्र माना जाता था। गर्मी आती थी, बारिश होती थी और फिर सर्दियों की दस्तक होती थी। लेकिन बदलते जलवायु हालात ने इस भरोसे को कमजोर कर दिया है। कभी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, कभी मूसलाधार बारिश, कभी फ्लैश फ्लड तो कभी लंबे समय तक सूखे जैसे हालात अब असामान्य नहीं रह गए हैं। सवाल यह है कि क्या आने वाले महीनों में मौसम का यह असंतुलन और गंभीर रूप लेने वाला है?
अल नीनो को लेकर सामने आ रहे पूर्वानुमानों ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी को लेकर वैज्ञानिक लगातार निगरानी कर रहे हैं। यदि अल नीनो मजबूत रूप लेता है तो इसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा।
क्या सर्दियों पर पड़ेगा असर?
सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि अल नीनो का असर भारत की सर्दियों पर कितना पड़ेगा। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इस साल सर्दी आएगी ही नहीं। लेकिन मजबूत अल नीनो की स्थिति में तापमान के सामान्य से ऊपर रहने की संभावना और मौसम के पारंपरिक पैटर्न में बदलाव से इनकार नहीं किया जा सकता।
उत्तरी और मध्य भारत में दिसंबर और जनवरी के दौरान कड़ाके की ठंड तथा शीतलहर का अनुभव आम बात है। ऐसे में यदि तापमान सामान्य से ऊपर रहता है तो सर्दी की अवधि और तीव्रता दोनों प्रभावित हो सकती हैं। इसका असर केवल लोगों की दिनचर्या तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कृषि, जल संसाधन और ऊर्जा की मांग पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
प्रशांत महासागर की गर्मी क्यों बढ़ा रही चिंता?
अल नीनो की शुरुआत मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के समुद्री सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने से जुड़ी होती है। समुद्र का तापमान बढ़ने पर वायुमंडलीय परिसंचरण और हवाओं के पैटर्न में बदलाव आता है। इसका प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्रों के मौसम पर भी पड़ सकता है।
इसीलिए प्रशांत महासागर में तापमान की हर असामान्य वृद्धि को वैज्ञानिक गंभीरता से देखते हैं। समुद्र के ऊपरी हिस्से के साथ-साथ गहरे पानी में मौजूद अतिरिक्त गर्मी भी इस पूरे मौसमी चक्र को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।
हाल के वर्षों में जिस तरह समुद्र और धरती दोनों का औसत तापमान बढ़ा है, उसने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। प्राकृतिक अल नीनो जब पहले से गर्म हो रही धरती के साथ जुड़ता है तो चरम मौसम की घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता मानसून
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में अल नीनो का प्रभाव सबसे पहले मानसून के संदर्भ में चिंता पैदा करता है। अतीत में कई मजबूत अल नीनो वर्षों में भारतीय मानसून कमजोर या असामान्य रहा है। हालांकि हर अल नीनो का प्रभाव एक जैसा नहीं होता और भारतीय मानसून पर अन्य समुद्री एवं वायुमंडलीय कारकों का भी प्रभाव पड़ता है।
फिर भी कमजोर मानसून का अर्थ केवल कम बारिश नहीं है। इसका सीधा असर खेती, जलाशयों, भूजल, बिजली उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यदि बारिश का वितरण असमान रहा तो कहीं सूखे जैसी स्थिति बन सकती है तो कहीं कम समय में अत्यधिक बारिश से बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
कहीं सूखा, कहीं बाढ़—बढ़ सकती है मौसम की मार
चरम मौसम की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इसका असर हर जगह एक जैसा नहीं होता। एक क्षेत्र में बारिश की कमी हो सकती है, जबकि दूसरे क्षेत्र में कुछ ही घंटों में इतनी बारिश हो सकती है कि बाढ़ जैसे हालात पैदा हो जाएं।
कम बारिश वाले क्षेत्रों में फसलों पर असर, जलाशयों में पानी की कमी और पेयजल संकट बढ़ सकता है। दूसरी ओर अत्यधिक बारिश वाले क्षेत्रों में शहरी बाढ़, फसल नुकसान, सड़क और बुनियादी ढांचे को नुकसान जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
इसी तरह तापमान बढ़ने से जंगलों में आग और सूखे की घटनाओं का खतरा भी बढ़ सकता है। मौसम का यह असंतुलन आने वाले समय में प्रशासन और समाज दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
ग्लोबल वार्मिंग ने बढ़ाई चुनौती
अल नीनो अपने आप में कोई नई घटना नहीं है। यह पृथ्वी की प्राकृतिक जलवायु प्रणाली का हिस्सा है। लेकिन आज समस्या यह है कि जब ऐसी प्राकृतिक घटनाएं उस समय सामने आती हैं, जब धरती पहले से ही बढ़ते तापमान से जूझ रही है, तो उनका प्रभाव ज्यादा गंभीर हो सकता है।
ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण वातावरण और महासागर गर्म हो रहे हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक अब अल नीनो जैसी प्राकृतिक घटनाओं को केवल अलग-थलग मौसमी घटना के रूप में नहीं देखते, बल्कि उन्हें व्यापक जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में समझते हैं।
2023-24 का अल नीनो और उसके दौरान दर्ज वैश्विक तापमान ने पूरी दुनिया को संकेत दे दिया था कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि वर्तमान की चुनौती है।
डरने से ज्यादा जरूरी है तैयारी
अल नीनो को लेकर सबसे जरूरी बात यह है कि इसके प्रभावों को लेकर अतिशयोक्ति से बचते हुए वैज्ञानिक पूर्वानुमानों को गंभीरता से लिया जाए। “सर्दी नहीं आएगी” जैसी निश्चित भविष्यवाणी लोगों में भ्रम पैदा कर सकती है। मौसम विज्ञान संभावनाओं पर आधारित है और परिस्थितियां समय के साथ बदल सकती हैं।
लेकिन चेतावनी को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।
भारत को आने वाले महीनों में जल प्रबंधन, कृषि योजना, फसल विविधीकरण, बिजली की मांग, पेयजल व्यवस्था और आपदा प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना होगा। किसानों को मौसम आधारित सलाह समय पर मिले, जलाशयों और भूजल की स्थिति पर लगातार निगरानी रहे तथा अत्यधिक गर्मी, सूखे और बाढ़ से निपटने की तैयारी पहले से हो—यही समझदारी होगी।
मौसम के बदलते तेवर हमें एक बात साफ-साफ बता रहे हैं—प्रकृति को नियंत्रित करने का दावा करने से बेहतर है उसके संकेतों को समझना और समय रहते तैयारी करना।
अल नीनो आएगा, कितना मजबूत होगा और उसका भारत पर वास्तविक प्रभाव कितना पड़ेगा, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में हर ऐसी चेतावनी को गंभीरता से लेना जरूरी है। क्योंकि सवाल केवल इस साल की सर्दी का नहीं है, सवाल आने वाली पीढ़ियों के मौसम और जीवन का भी है।